महल और लंगोटी

राजा जनक की नृत्यशाला में शराब चल रही थी और कम वस्त्रों में नृत्यांग्नाएं चारों ओर अपनी छटा बिखेर रही थीं। तभी एक विद्वान भिक्षु ने वहां प्रवेश किया। महाराज ने भिक्षु को पूरा आनन्द उठाने को कहा और बोले कि ज्ञान की बातें बाद में करेंगे। यह सुनकर वह साधु बडबडाता हुआ चला गया कि यह ज्ञानी राजा तो बड़ा ढोंगी है कि एक विद्वान् की संगत से अधिक उसे निचले दर्जे के मनोरंजन में आनन्द आ रहा है। अगले दिन सुबह राजा जनक इस विद्वान् के साथ नदी में नहाने पहुंचे। नहाने से पहले भिक्षु ने सावधानी से अपनी लंगोटी राजभवन के पास संभाल के रख दी। जब महाराज और विद्वान् ज्ञान की वार्ता में लगे हुए थे तो अचानक राजमहल में आग लग गयी और आग की लपटों ने राजमहल को चारों ओर से घेर लिया। यह देख वह विद्वान भिक्षु बहुत अधिक उत्तेजित हो गया और वह महल की ओर अपनी लंगोटी बचाने के लिए भागा। इसके विपरीत राजा जनक अपने महल को जलता देखकर भी (उद्वेलित) विचलित नहीं हुए और विद्वान की चिन्ता देखकर ठहाके मारकर हंसने लग।  यह दृश्य देखकर उस विद्वान को महसूस हुआ कि उसकी और राजा जनक की चेतना के स्तर में कितना अधिक अन्तर था।

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